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गांधी और नरेंद्र मोदी के लिए विधानसभा चुनाव के नतीजों के क्या मायने

वैसे कमलनाथ की क्षमता और क़ाबिलियत को लेकर उनके विरोधी भी संदेह नहीं रखते, ये बात दूसरी है कि कमलनाथ ख़ुद को बड़ा ही लो प्रोफ़ाइल रखते आए हैं.
वरना गांधी परिवार से निकटता, पूरे पचास साल का राजनीतिक जीवन और ख़ुद का अरबों का कारोबारी साम्राज्य, उन्हें हरवक़्त चर्चा में बनाए रखने के लिए कम नहीं हैं.
दरअसल, कमलनाथ संजय गांधी के स्कूली दोस्त थे, दून स्कूल से शुरू हुई दोस्ती, मारुति कार बनाने के सपने के साथ-साथ युवा कांग्रेस की राजनीति तक जा पहुंची थी.
पत्रकार विनोद मेहता ने अपनी किताब संजय गांधी - अनटोल्ड स्टोरी में लिखा है कि यूथ कांग्रेस के दिनों में संजय गांधी ने पश्चिम बंगाल में कमलनाथ को सिद्धार्थ शंकर रे और प्रिय रंजन दासमुंशी को टक्कर देने के लिउतारा था.
इतना ही नहीं जब इमरजेंसी के बाद संजय गांधी गिरफ्तार किए गए तो उनको कोई मुश्किल नहीं हो, इसका ख़्य़ाल रखने के लिए जज के साथ बदतमीज़ी करके कमलनाथ तिहाड़ जेल भी पहुंच गए थे.
इन वजहों से वे इंदिरा गांधी की गुड बुक्स में आ गए थे, 1980 में जब पहली बार कांग्रेस ने उन्हें मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा से टिकट दिया था. उनके चुनाव प्रचार में इंदिरा गांधी ने अपने भाषण में कहा था,- मैं नहीं चाहती कि आप लोग कांग्रेस नेता कमलनाथ को वोट दीजिए. मैं चाहती हूं कि आप मेरे तीसरे बेटे कमलनाथ को वोट दें.
कांग्रेस को लंबे समय से कवर कर रहे एनडीटीवी इंडिया के राजनीतिक संपादक मनोरंजन भारती कहते हैं, - लोग ये भी कहने लगे थे कि इंदिरा के दो हाथ- संजय गांधी और कमलनाथ.
आदिवासी और नामालूम इलाक़े से 1980 में पहली बार जीतने वाले कमलनाथ ने छिंदवाड़ा की तस्वीर पूरी तरह से बदल दी.
इलाक़े से नौ बार सांसद बनने के साथ उन्होंने यहां स्कूल-कॉलेज और आईटी पार्क तक बनवाए हैं. इतना ही नहीं स्थानीय लोगों को रोज़गार और काम धंधा मिले, इसके लिए उन्होंने वेस्टर्न कोलफील्ड्स और हिंदुस्तान यूनीलिवर जैसी कंपनियां खुलवाई हैं. साथ में क्लॉथ मेकिंग ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, ड्राइवर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट भी उन्होंने इलाक़े में खुलवाए.
वैसे पहले संजय गांधी की मौत और उसके बाद इंदिरा गांधी की हत्या ने कमलनाथ के राजनीतिक करियर के उठान पर असर ज़रूर डाला लेकिन वे कांग्रेस और गांधी परिवार के प्रति प्रतिबद्ध बने रहे.
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख विरोधी दंगों में उनका नाम भी आया था लेकिन उनकी भूमिका सज्जन कुमार या जगदीश टाइटलर जैसे नेताओं की तरह स्पष्ट नहीं हो सकी.
कमलनाथ पर आरोप है कि वे एक नवंबर, 1984 को नई दिल्ली के गुरुद्वारा रकाबगंज में उस वक्त मौजूद थे जब भीड़ ने दो सिखों को जिंदा जला दिया था.
खास बात ये है कि कमलनाथ ने हादसे के वक्त वहां अपनी मौजूदगी से कभी इनकार नहीं किया है. उन्होंने कई बार मीडिया के सामने ये दोहराया है- मैं वहां मौजूद था क्योंकि मेरी पार्टी ने मुझे वहां पहुंचने को कहा था, गुरुद्वारे के बाहर भीड़ मौजूद थी, मैं उन्हें हमला करने से रोक रहा था. पुलिस ने भी मुझसे भीड़ को नियंत्रित करने की गुजारिश की थी.
कमलनाथ ये भी कहते हैं कि 1984 के दंगों की एसआईटी जांच, रंगनाथ मिश्रा कमीशन इन्कवायरी और जीटी नानावती कमीशन इन्कवायरी ने उनके खिलाफ कुछ नहीं पाया है और वे ज़रूरत पड़ने पर किसी और भी जांच का सामना करने को तैयार हैं. हालांकि एक सच ये भी है कि सिख दंगों में उनकी भूमिका को लेकर बातें तभी शुरू होती हैं जब उन्हें कोई बड़ी भूमिका मिलने का इंतजार होता है. लेकिन ये भी जाहिर होता रहा है कि इसका असर उनके करियर पर ज्यादा नहीं पड़ा है.
1984 के सिख दंगों और 1996 के हवाला कांड को अगर अपवाद मान लें तो सालों साल तक अहम मंत्रालयों के मंत्री रहने के बाद भी कमलनाथ का नाम किसी विवादों में नहीं आया है और ना ही उन पर भ्रष्टाचार के कोई दूसरे संगीन आरोप लगे.
वे पर्यावरण, अर्बन डेवलपमेंट, कॉमर्स एंड इंडस्ट्री जैसे अहम महकमों के मंत्री रह चुके हैं.

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